School ki Purani Dayri| स्कूल की पुरानी डायरी का राज़

स्कूल की पुरानी डायरी का राज़: अकांक्षा प्रज्ञा की पुरानी डायरी पढ़ती, जिसमें बचपन के क्रश की बातें। शर्म और उत्साह में, वे रोल-प्ले करतीं – प्रज्ञा ‘सर राजेश’ बनती, लेकिन असली स्पर्श अकांक्षा का। बेड पर, आइज़ बंद करके किस, फिर स्ट्रैप-ऑन से ‘क्रश’ को जीवंत करना, आंसुओं और कराहों के बीच।school ki purani dayri

अध्याय 1: बचपन की दोस्ती और पहली चिंगारी

पटना की गलियों में, जहां गंगा की लहरें शहर को सहलाती हैं, दो छोटी लड़कियां स्कूल की दीवारों के पीछे खेलतीं। प्रज्ञा श्रीवास्तव, सात साल की, हमेशा गाती रहती। उसकी आवाज़ में एक जादू था – जैसे कोई पुरानी भक्ति गीत जीवंत हो उठे। उसके बाल दो चोटियों में बंधे, और आंखें चमकतीं जैसे स्टेज की लाइट्स। अकांक्षा कुमारी, उसी उम्र की, शर्मीली लेकिन तेज़। वह किताबों में खोई रहती, लेकिन प्रज्ञा की हंसी सुनते ही दौड़ पड़ती। दोनों एक ही क्लास में पढ़तीं, सेंट जोसेफ़ कॉन्वेंट स्कूल में।

“प्रज्ञा, तू फिर गा रही है? क्लास में मिस्टर सिंह जी डांटेंगे!” अकांक्षा ने हंसते हुए कहा, जब प्रज्ञा ने स्कूल ग्राउंड में एक लोकगीत गुनगुनाना शुरू किया।school ki purani dayri

“अरे, अक्कू, गाना तो जीना है। तू भी गा ना!” प्रज्ञा ने उसके हाथ खींचे और दोनों घूमने लगीं। उनकी दोस्ती ऐसी थी – बिना शर्त, बिना सवाल। शाम को स्कूल से निकलते हुए, वे पटना के बाज़ारों में घूमतीं, चाट खातीं, और सपने बुनतीं। प्रज्ञा कहती, “मैं बड़ा होकर स्टेज पर गाऊंगी, दुनिया भर में मशहूर!” अकांक्षा मुस्कुराती, “और मैं डॉक्टर बनूंगी, तुझे बीमार होने पर फ्री इलाज दूंगी।”

स्कूल में एक नाम था जो दोनों के दिलों में बस गया – मिस्टर राजेश कुमार, लैब इंस्ट्रक्टर। वह बायोलॉजी लैब का इंचार्ज था, लंबा, स्मार्ट, हमेशा सफेद कोट में। उसकी मुस्कान में एक रहस्य था। प्रज्ञा और अकांक्षा लैब क्लास के बहाने उससे बातें करतीं। “सर, ये फ्रॉग का दिल कैसे धड़कता है?” प्रज्ञा पूछती, आंखें चमकाती। अकांक्षा चुपचाप देखती, उसके चेहरे पर लाली चढ़ जाती। दोनों को वह पसंद था – एक साथ। रातों में अकांक्षा अपने बिस्तर पर लेटी सोचती, सर की वो हंसी… और प्रज्ञा के गाने। प्रज्ञा भी, अपनी डायरी में लिखती: “सर और अक्कू… दोनों मेरे।”school ki purani dayri

लेकिन बचपन बीत गया। हाईस्कूल के बाद रास्ते अलग हो गए। अकांक्षा ने कॉमर्स चुना, प्रज्ञा आर्ट्स। फिर कॉलेज, नौकरी की तलाश। पटना की ज़िंदगी ने उन्हें अलग कर दिया। प्रज्ञा स्टेज पर चढ़ी, लोकल शोज़ में गाती, लेकिन अकेलापन सताने लगा। अकांक्षा घर पर रहती, मां-बाप की उम्मीदों के बोझ तले दबी। दोनों का संपर्क टूटा, लेकिन यादें बचीं।school ki purani dayri

अध्याय 2: अकेलापन और फिर मिलन

दो साल बीत चुके थे। अकांक्षा कुमारी, अब 22 की, पटना के एक छोटे से ऑफिस में इंटरव्यू के लिए बैठी थी। हंड्रेड कंपनी – एक नई सेल्स फर्म, जो इलेक्ट्रॉनिक्स बेचती। “मिस कुमारी, आप सेल्स एक्ज़ीक्यूटिव के लिए परफेक्ट हैं। कल से जॉइन कर लें।” बॉस की आवाज़ ने उसे राहत दी। लेकिन घर लौटते हुए, गंगा पुल पर खड़ी होकर सोचा – ये ज़िंदगी कैसी? नौकरी मिली, लेकिन दिल खाली। बचपन की वो दोस्त प्रज्ञा कहां? फेसबुक पर सर्च किया – प्रज्ञा श्रीवास्तव, स्टेज परफॉर्मर। फोटोज़ में वह चमक रही, माइक थामे, लेकिन आंखों में उदासी।school ki purani dayri

एक शाम, प्रज्ञा का कॉन्सर्ट था – पटना के एक छोटे हॉल में। अकांक्षा ने टिकट लिया, बिना बताए। स्टेज पर प्रज्ञा ने गाना शुरू किया – “ये रातें अकेली…”। अकांक्षा की आंखें नम हो गईं। कॉन्सर्ट खत्म होने पर, बैकस्टेज गई। “प्रज्ञा? मैं… अकांक्षा।”

प्रज्ञा ठिठकी, फिर चिल्लाई, “अक्कू!” दोनों गले लगीं। आंसू, हंसी, सब मिला। “तू कहां थी? मैंने तुझे इतना मिस किया!” प्रज्ञा ने कहा। वे एक कैफे में बैठीं, रात भर बातें कीं। अकेलापन – प्रज्ञा ने बताया कैसे स्टेज पर तालियां मिलतीं, लेकिन घर लौटकर खाली कमरा। “लोग देखते हैं, लेकिन कोई साथ नहीं।” अकांक्षा ने अपनी नौकरी की बात की – “सेल्स टारगेट, बॉस की डांट, लेकिन रातें… बस फोन स्क्रॉल।”

दोस्ती फिर लौटी। रोज़ मैसेज, कॉल्स। अकांक्षा की नई जॉब में प्रज्ञा सपोर्ट करती – “तू कर लेगी, अक्कू।” प्रज्ञा के शोज़ में अकांक्षा क्लैपिंग करती। लेकिन रातें बदलने लगीं। एक बार, प्रज्ञा के फ्लैट पर रुकी अकांक्षा। बरसात की रात, बिजली गई। मोमबत्ती की रोशनी में, वे पास बैठीं। “याद है सर राजेश?” प्रज्ञा ने पूछा। अकांक्षा शरमाई, “हां… वो हम दोनों को पसंद था।” हंसी उड़ी, लेकिन हवा में कुछ और था – एक स्पर्श, जो दोस्ती से आगे था।

पुरानी यादों की रात: तीन दिलों का मिलन

पटना के एक पुराने स्कूल हॉल के पीछे, रीयूनियन की शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। लाइटें मद्धम, हंसी की गूंज दूर कहीं। प्रज्ञा और अकांक्षा, दोनों की आंखों में वो पुरानी चिंगारी जल रही थी – सर राजेश कुमार के लिए, जो अब रिटायर्ड हो चुके थे, लेकिन उम्र ने उनकी आकर्षकता को कम नहीं किया था। लंबा कद, सफेद बालों में चांदी की चमक, और वो मुस्कान जो कभी लैब में फ्रॉग के दिल की धड़कन सिखाती थी। आज, वे तीनों एक कोने में मिले थे। बातें पुरानी, शराब की चुस्कियां नई।

“सर, याद है वो लैब क्लास? हम दोनों आपकी तरफ देखा करतीं, जैसे कोई एक्सपेरिमेंट हो,” प्रज्ञा ने हंसते हुए कहा, अपनी उंगली से सर के हाथ को सहलाते हुए। अकांक्षा शरमाई, लेकिन उसकी आंखें बोल रही थीं – चाहत की। सर राजेश ने गिलास नीचे रखा, उनकी तरफ झुके। “तुम दोनों… हमेशा स्पेशल थीं। अब भी हो।” उनकी आवाज़ गहरी, जैसे कोई पुराना गीत।

वे बाहर निकले, सर का पुराना बंगला – गंगा की ओर खुला। ड्राइविंग में, प्रज्ञा ने अकांक्षा का हाथ पकड़ा, सर को आईने में देखा। “ये रात हमारी हो,” फुसफुसाया। घर पहुंचे तो बारिश शुरू हो गई। गीले कपड़ों में अंदर घुसे। लिविंग रूम में, फायरप्लेस की लौ चमक रही। सर ने जैकेट उतारी, उनकी चौड़ी छाती नजर आई। प्रज्ञा ने पहला कदम बढ़ाया – सर के पास जाकर, उनके गाल पर किस किया। नरम, लेकिन जुनूनी। “सर… हमने हमेशा कल्पना की थी।”

अकांक्षा करीब आई, सर की कमर पर हाथ रखा। सर ने दोनों को अपनी ओर खींचा, गले लगाया। “मेरी प्यारी स्टूडेंट्स…” उनके होंठ प्रज्ञा के होंठों से मिले – गहरा किस, जीभ का नृत्य। प्रज्ञा सिहर उठी, उसके हाथ सर की शर्ट में सरक गए, बटन खोलते हुए। अकांक्षा पीछे से सर को चूमने लगी – गर्दन पर, कान पर। सर की सांसें तेज़। “तुम दोनों… कितनी खूबसूरत।”

वे बेडरूम में पहुंचे। बड़ा बेड, सफेद शीट्स। सर ने प्रज्ञा को लिटाया, उसके ऊपर झुका। होंठों से किस की बौछार – गले पर, छाती पर। प्रज्ञा की साड़ी खुल गई, ब्रा के ऊपर से सर के दांत निप्पल्स को छुए। “आह… सर!” प्रज्ञा कराही। अकांक्षा बगल में लेटी, सर का हाथ उसके स्कर्ट में – पैंटी के ऊपर से सहलाना, फिर अंदर। अकांक्षा की उंगलियां सर के पैंट में सरक गईं, उनके कठोर सदस्य को पकड़ा। “सर… ये हमारा था।”

प्रज्ञा ने सर को नंगा किया, उनका शरीर मज़बूत, अनुभवी। वह नीचे झुकी, होंठों से उनके सदस्य को चूमा – जीभ से चाटा, धीरे-धीरे मुंह में लिया। सर कराहे, “प्रज्ञा… अच्छा लग रहा है।” अकांक्षा प्रज्ञा के नीचे आ गई, उसकी टांगें फैलाईं। जीभ से प्रज्ञा के क्लिटोरिस को छुआ, चूसा। प्रज्ञा तड़पी, सर के सदस्य पर मुंह दबाते हुए। तीनों का रिदम – सिसकारियां, स्पर्श।

सर ने पोज़िशन बदली। प्रज्ञा को डॉगी स्टाइल में किया, पीछे से प्रवेश – गहरा, धीमा। “तुम्हारी… इतनी टाइट,” सर फुसफुसाए। प्रज्ञा चीखी, आनंद में। अकांक्षा सर के नीचे लेटी, उनके होंठ उसके ब्रेस्ट्स पर। सर का एक हाथ अकांक्षा के अंदर उंगलियां डाल रहा, दूसरा प्रज्ञा की कमर पर। प्रज्ञा ने झुककर अकांक्षा को किस किया – उनकी जीभें मिलीं, सर के थ्रस्ट्स के साथ। “अक्कू… सर… हम तीनों…”

फिर बारी अकांक्षा की। सर ने उसे लिटाया, ऊपर चढ़े। प्रवेश करते हुए, “तुम मेरी हो।” अकांक्षा की टांगें सर की कमर पर लिपटीं, नाखूनों से खरोंच। प्रज्ञा बगल में, अकांक्षा के निप्पल्स चूसती, सर के पीठ पर किस। जीभ से सर के नितंबों को छुआ। रिदम तेज़ – बेड हिल रहा, बारिश की बूंदें खिड़की पर। अकांक्षा चरम पर पहुंची, “सर… प्रज्ञा… आह!” उसके बाद सर, प्रज्ञा के मुंह में। प्रज्ञा ने निगला, मुस्कुराई।

वे तीनों गले लगे लेटे। सर के सीने पर सिर रखे, प्रज्ञा और अकांक्षा ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा। “ये सपना था… अब हकीकत,” सर ने कहा। रात भर, स्पर्श बने रहे – कोमल किस, सहलाहट। पुरानी दोस्ती, नया प्यार – तीन दिलों का अनंत मिलन। सुबह, गंगा की लहरें गवाह बनीं।

अध्याय 3: पहली रात का जादू

महीनों बीते। अकांक्षा की जॉब सेटल हो गई – हंड्रेड कंपनी में वह टॉप सेलर बन रही। प्रज्ञा के शोज़ बढ़े, लेकिन दोनों का साथ ही सब कुछ था। एक रात, प्रज्ञा का बर्थडे था। अकांक्षा ने सरप्राइज़ प्लान किया – घर पर डिनर, वाइन, और पुरानी यादें। “तू मेरी बेस्ट फ्रेंड है, प्रज्ञा। लेकिन… अब कुछ और लगता है।” अकांक्षा ने शराब के नशे में कहा।

प्रज्ञा की आंखें चमकीं। “मुझे भी, अक्कू। स्कूल से ही… सर के बहाने, लेकिन असल में तू।” वे करीब आईं। होंठ मिले – नरम, गर्म। पहला किस, जो सालों की चाहत को जगा गया। प्रज्ञा ने अकांक्षा का हाथ पकड़ा, बेडरूम में ले गई। कमरे में हल्की लाइट, बिस्तर पर सफेद शीट्स। “तू मेरी है,” प्रज्ञा ने फुसफुसाया।

अकांक्षा की सांसें तेज़। प्रज्ञा ने उसकी शर्ट उतारी, धीरे-धीरे। उंगलियां गर्दन पर, फिर छाती पर। अकांक्षा सिहर उठी। “प्रज्ञा… ये…” लेकिन शब्द रुक गए। प्रज्ञा नीचे झुकी, होंठों से किस किया – गले पर, फिर नीचे। अकांक्षा के हाथ प्रज्ञा के बालों में उलझे। प्रज्ञा की जीभ ने उसके निप्पल्स को छुआ, चूसा, जैसे कोई मीठा फल। अकांक्षा कराह उठी, “आह… प्रज्ञा…”।

वे नंगी हो गईं। प्रज्ञा ने अकांक्षा को लिटाया, उसके शरीर पर किस बरसाए। पेट पर, नाभि पर, फिर नीचे। अकांक्षा की टांगें फैलीं, प्रज्ञा की उंगलियां अंदर सरक गईं – गीली, गर्म। “तू कितनी सॉफ्ट है,” प्रज्ञा ने कहा, धीरे-धीरे मूवमेंट बढ़ाते हुए। अकांक्षा चीखी, आनंद में। फिर बारी अकांक्षा की – उसने प्रज्ञा को उल्टा किया, पीठ पर किस, फिर नितंबों पर। जीभ से चाटा, प्रज्ञा तड़पी। दोनों एक-दूसरे में खो गईं – उंगलियां, होंठ, सिसकारियां। रात भर, वे लेस्बियन प्रेम में डूबीं – कोई शर्म नहीं, सिर्फ़ चाहत। सुबह, गले लगे सोईं। ये वन नाइट स्टैंड नहीं था – ये शुरुआत थी।

अध्याय 4: गहराती मोहब्बत और पुरानी यादें

रिश्ता पनपा। दिन में अकांक्षा ऑफिस जाती, प्रज्ञा प्रैक्टिस। शाम को मिलतीं – कभी गंगा किनारे वॉक, कभी प्रज्ञा के फ्लैट पर। लेकिन बेडरूम उनका राज़ था। हर रात, वे एक्सप्लोर करतीं। एक बार, प्रज्ञा ने स्ट्रैप-ऑन ट्राई किया – अकांक्षा को डॉगी स्टाइल में लिया, पीछे से। “फास्टर… प्रज्ञा!” अकांक्षा चीखी, दीवार थरथराई। प्रज्ञा ने उसके बाल खींचे, किस किए। दूसरी रात, 69 पोज़िशन – दोनों एक-दूसरे को चाटतीं, चूसतीं, आनंद के शिखर पर। “तू मेरी रानी है,” अकांक्षा फुसफुसाती, प्रज्ञा के क्लिटोरिस पर जीभ फेरते हुए। पसीना, सिसकारियां, और प्यार – सब मिला।

लेकिन पुरानी यादें सतातीं। एक दिन, स्कूल का रीयूनियन। वहां सर राजेश मिले – अब रिटायर्ड, लेकिन वैसा ही स्मार्ट। “बेटियां, कितनी बड़ी हो गईं!” दोनों घबरा गईं। शाम को घर लौटकर, बात हुई। “सर को प्यार करते थे हम, लेकिन अब… ये गलत था?” प्रज्ञा ने पूछा। अकांक्षा ने गले लगाया, “नहीं। वो क्रश था। असली प्यार तू है।” वे फिर बिस्तर पर। इस बार सॉफ्ट – किस, सहलाना। प्रज्ञा ने अकांक्षा के अंदर उंगलियां डालीं, धीरे-धीरे, जैसे पुरानी यादों को धोते हुए। अकांक्षा ने प्रज्ञा के ब्रेस्ट्स को दबाया, चूसा। “हमारी दुनिया यहीं है,” वे बोलीं। अकेलापन गया, दोस्ती प्यार बनी।

अध्याय 5: शादी का सपना और नई शुरुआत

साल भर बीता। प्रज्ञा के शोज़ नेशनल हो गए, अकांक्षा प्रमोशन पा चुकी। लेकिन समाज? पटना में दो लड़कियों का रिश्ता – मुश्किल। परिवार को बताया – मां-बाप शॉक्ड, लेकिन प्यार ने जीता। “हम साथ रहेंगीं,” प्रज्ञा ने कहा। वे शादी प्लान करने लगीं – लीगल नहीं, लेकिन सेलिब्रेशन। एक छोटा सा रिचुअल, गंगा किनारे।

शादी की पूर्व संध्या, वे फिर बेडरूम में। प्रज्ञा ने अकांक्षा को व्हाइट साड़ी में सजाया। “मेरी दुल्हन,” कहा। किस शुरू हुए – जुनूनी। प्रज्ञा ने साड़ी खोली, अकांक्षा को नंगा किया। उंगलियां, जीभ – हर जगह। अकांक्षा ने प्रज्ञा को लिटाया, उसके शरीर पर तेल मला, मसाज की। फिर स्ट्रैप-ऑन से पेनेट्रेट किया, धीरे, गहरा। “हमेशा साथ,” प्रज्ञा कराही। चरम पर पहुंचीं दोनों, आंसू बहते।

सुबह, गंगा किनारे वादा। “हमारी शादी,” दोस्तों के बीच। पटना की हवाओं में, उनकी कहानी उड़ी – दोस्ती से प्यार, अकेलेपन से साथ। प्रज्ञा गाई, अकांक्षा ने डांस किया। जीवन नया – स्टेज, जॉब, और एक-दूसरे का बेड। लेस्बियन मोहब्बत, अनंत।

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